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Channel: शहर –आवारा हूँ…
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हमारे हिस्से की ‘पैरासाइट’

Spoilers ahead…  सुनील खिलनानी अपनी मील का पत्थर पुस्तक ‘दी आइडिया ऑफ़ इंडिया’ में नई दिल्ली शहर की बसावट को लेकर मुख्य स्थापत्यकार एडविन लुटियंस और उनके चीफ़ असिस्टेंट हरबर्ट बेकर के बीच हुई एक बहुत...

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नीले और लाल से मिलकर बनी ‘काला’की चुनौती

करण जौहर द्वारा निर्मित ‘धड़क’ ने बहस का नया पिटारा खोल दिया है। नागराज मंजुले की माइलस्टोन मराठी फ़िल्म ‘सैराट’ की ऑफिशियल हिंदी रीमेक। यह तो अच्छा है कि अब हिन्दी सिनेमा बाकायदा दूसरी भाषाओं की...

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एन इनसिग्निफिकेंट मैन : जैसे अपने नायक को बिना कवच-कुंडल के देखना

पहली बार न्यूज़लॉड्री हिन्दी पर प्रकाशित हुआ आलेख। पूरी फ़िल्म VICE के यूट्यूब चैनल पर देखे जाने के लिए यहाँ उपलब्ध है। फ़िल्म देखकर आलोचना पढ़ेंगे तो आैर अच्छा होगा। _____ तीन साल पहले लॉरा पॉइट्रास...

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न्याय के बिना कोई बराबरी संभव नहीं है : अलीगढ़

निर्देशक ‘हंसल मेहता’ की ‘अलीगढ़’ इस साल का सबसे गहरे पानी में डूबा मोती है. उनींदे से उत्तर भारतीय शहर के हृदय में बसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में मराठी पढ़ाने वाले विदुर प्रोफेसर के घर देर रात...

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वो पांच प्रसंग जब हमारा सिनेमा बड़ा हो रहा था : सिनेमा 2016

‘बॉलीवुड’ कहा जाने वाला मुख्यधारा हिन्दी सिनेमा हमेशा से मेरे लिए एक बहुवचन रहा है. कई नितांत भिन्न, आपस में टकराती पहचानों को साथ संभालने की कोशिश करता माध्यम. आैर फिर सिनेमा तो ठहरा भी सामुदायिक...

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“हम चीज़ों को भूलने लगते हैं, अगर हमारे पास कोई होता नहीं उन्हें बताने के...

“हम चीज़ों को भूलने लगते हैं, अगर हमारे पास कोई होता नहीं उन्हें बताने के लिए” स्थापत्यकार राहुल महरोत्रा समकालीन मुम्बई शहर की विरोधाभासी संरचना को केन्द्र बनाकर लिखे गए अपने चर्चित निबंध में शहर की...

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सुंदर का स्वप्न : शिप अॉफ थिसियस

शायद किराये के मकानों में ऐसा अक्सर होता है। जिस घर में हम रहने अाये, उसकी दीवारों पर पिछले रहनेवालों के निशान पूरी तरह मिटे नहीं थे। ख़ासकर बच्चों की उपस्थिति के निशान। कमरे की दीवारों पर रंग बिरंगी...

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नाम-पते वाला सिनेमा : 2012 Roundup

फिर एक नया साल दरवाज़े पर है अौर हम इस तलाश में सिर भिड़ाए बैठे हैं कि इस बीते साल में ‘नया’ क्या समेटें जिसे अागे साथ ले जाना ज़रूरी लगे। फिर उस सदा उपस्थित सवाल का सामना कि अाखिर हमारे मुख्यधारा...

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केंचुल उतारता शहर

हंसल मेहता वापस अाए हैं बड़े दिनों बाद। अपनी नई फ़िल्म ‘शाहिद’ के साथ, जिसकी तारीफें फ़िल्म समारोहों में देखनेवाले पहले दर्शकों से लगातार सुनने को मिल रही हैं। उनकी साल 2000 में बनाई फ़िल्म ‘दिल पे मत...

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कितने बाजू, कितने सर

एमए के दिनों की बात है। हम देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में थे और यहाँ छात्रसंघ चुनावों में वाम राजनीति को फिर से खड़ा करने की एक और असफ़ल कोशिश कर रहे थे। उन्हीं दिनों पंजाब से आए उन साथियों से...

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’आई एम 24’ और सौरभ शुक्ला का लेखक अवतार

पिछले दिनों रिलीज़ हुई ‘आई एम 24’ पुरानी फ़िल्म है। लेकिन इसके बहाने मैं पुन: दोहराता हूँ उस व्यक्ति के काम को जिसने कभी अनुराग कश्यप के साथ मिलकर ’सत्या’ लिखी थी और हमारे सिनेमा को सिरे से बदल दिया...

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बच्चन

वे भिन्न थे। अाज से खड़े होकर देखने से चाहे भरोसा न हो, लेकिन जब वे अाए थे, तब वे सिनेमा का ’अन्य’ थे। और उन्होंने इसे ही अपनी ताक़त बनाया। उस ’सिनेमा के अन्य’ को सदा के लिए कहानी का सबसे बड़ा नायक...

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’बरफ़ी’ का रेलगाड़ी वाला शहर

“हर भले आदमी की एक रेल होती है जो माँ के घर की ओर जाती है सीटी बजाती हुई धुआँ उड़ाती हुई” ~ आलोक धन्वा अनुराग बासु की ’बरफ़ी’ कुछ मायनों में चुनौतीपूर्ण फ़िल्म है और बहुत से मामलों में बहुत पारम्परिक।...

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’शांघाई’ के सर्वहारा

हम जेएनयू में हैं। छात्रों का हुजूम टेफ़्लास के बाहर कुछ कुर्सियाँ डाले दिबाकर के आने की इन्तज़ार में है। प्रकाश मुख्य आयोजक की भूमिका में शिलादित्य के साथ मिलकर आखिरी बार सब व्यवस्था चाक-चौबंद करते...

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2011 : सिनेमा

“आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें” – फ़राज़ ’जा चुके परिंदों को बुलाता कोई’ फ़िल्म – ’रॉकस्टार’ “पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल....

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रॉकस्टार : सिनेमा जो कोलाज हो जाना चाहता था

पहले जुम्मे की टिप्पणी है. इसलिए अपनी बनते पूरी कोशिश है कि बात इशारों में हो और spoilers  न हों. फिर भी अगर आपने फ़िल्म नहीं देखी है तो मेरी सलाह यही है कि इसे ना पढ़ें. किसी बाह्य आश्वासन की दरकार लगती...

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